भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ अंतर्गत प्रेरणा संवाद का हुआ आयोजन.

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ब्राज़ील के पद्म श्री जोनास मसेट्टी ने ‘अद्वैत और आधुनिक विज्ञान’ पर युवाओं से किया संवाद

IISER भोपाल में हुआ प्रेरक संवाद

ब्राज़ील के पद्मश्री जोनास मसेट्टी ने युवाओं से साझा किए विचार

आईसर में आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा आयोजित प्रेरणा संवाद में कहा

वैदिक संस्कृति को समझने के लिए वेदांत को जानना आवश्यक

अध्यात्म जीवन को समृद्ध करता है : पद्म श्री जोनास मसेट्टी

ज्ञान से बढ़कर कुछ भी पवित्र नहीं : स्वामी आत्मप्रियानंद

जीवन के विज्ञान की खोज करना ही वेदांत है

राहुल वेल्लाल का हुआ गायन,
अयिगिरि नन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते. …

भारत भवन में आज होगा संवाद

भोपाल। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन द्वारा उपनिषदों में निहित अद्वैत सिद्धांत को जन-जन तक पहुँचाने हेतु शंकर व्याख्यानमाला, एकात्म संवाद एवं प्रेरणा संवाद जैसे विविध प्रेरक कार्यक्रमों का नियमित आयोजन किया जाता है।

इसी श्रृंखला में आज भोपाल में दो दिवसीय कार्यक्रम के पहले दिन भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) भोपाल में ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ अंतर्गत प्रेरणा संवाद आयोजित हुआ। इसमें ‘अद्वैत और आधुनिक विज्ञान’ विषय पर ब्राज़ील के पद्म श्री आचार्य जोनास मसेट्टी और स्वामी आत्मप्रियानंद (प्रति कुलपति, रामकृष्ण मिशन विवेकानंद शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थान, बेलूर मठ) ने वैज्ञानिक, प्रोफेसर, शोधार्थी एवं 750 से अधिक छात्रों से संवाद किया। संस्थान के निदेशक प्रो. गोवर्धन दास ने कहा कि छात्रों के लिए यह संवाद प्रेरणादायक है।

पद्म श्री जोनास मसेट्टी ने कहा कि वैदिक संस्कृति को समझने के लिए वेदांत को जानना आवश्यक है। मानवता अचानक प्रकाशित नहीं होती; पहले भीतर परिवर्तन होता है, तब जाकर हमारे अंत:करण में परिवर्तन घटित होता है। स्वतंत्रता और सुख भीतर से उत्पन्न होते हैं। उन्होंने कहा कि मानवीय संबंधों का आदान–प्रदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। अध्यात्म कोई विकल्प नहीं है, बल्कि अध्यात्म आत्म-विकास की प्रकिया है। आत्म-विकास एवं साधना के लिए गुरु की आवश्यकता होती है।

जोनास ने कहा कि हमें अपने ज्ञान का उपयोग केवल बाह्य संसार के लिए नहीं, बल्कि अपनी आंतरिक यात्रा के लिए भी करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अध्यात्म हमारे जीवन का विरोध नहीं करता, बल्कि उसे और बेहतर बनाता है। अध्यात्म जीवन को समृद्ध करता है और जप, आसन, ध्यान तथा प्राणायाम जैसे साधन हमें एक श्रेष्ठ जीवन जीने में सहायक होते हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि श्रोडिंगर, ओपेनहाइमर, कोपेनहेगन और रामानुज जैसे महान विद्वानों ने भी उपनिषदों का अध्ययन किया था। उनके अनुसार अध्यात्म का संबंध केवल साधना या पूजा से नहीं, बल्कि व्यवसाय और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से है। उन्होंने कहा कि भारतीय होने का अर्थ केवल जन्म से नहीं, बल्कि इस राष्ट्र के मूल्यों और संस्कृति को बनाए रखने से है। समाज और मानवता में वास्तविक परिवर्तन तभी संभव है, जब वह भीतर से प्रारंभ हो। इसलिए आवश्यक है कि परिवर्तन व्यक्तिगत स्तर पर भी हो और वैश्विक स्तर पर भी।

उपनिषद गहन उत्तरों और सरल प्रश्नों का अद्भुत संगम : स्वामी आत्मप्रियानंद

रामकृष्ण मिशन विवेकानंद शैक्षिक एवं अनुसंधान संस्थान, बेलूर मठ के प्रति कुलपति स्वामी आत्मप्रियानंद ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ज्ञान में कोई विभाजन या अंतराल नहीं होता; वह अखंड, अविभाज्य और एकीकृत संपूर्ण है। उन्होंने बताया कि शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण अंग श्रवण है, वेदांत का ज्ञान श्रवण से ही आरंभ होता है। उन्होंने कहा कि वाक् पवित्र है – वही सरस्वती है, वही ज्ञान का रूप है। उन्होंने बताया कि सबसे गुप्त और पवित्र ज्ञान प्राचीन काल में सूत्रों और मंत्रों के रूप में सुरक्षित रखा गया था। भ्रम से ही ज्ञान का उदय होता है, और केवल प्राण ही दूसरे प्राण को प्रज्वलित कर सकता है। एक सच्चा गुरु केवल शब्द नहीं सिखाता, वह शिक्षा का सार संप्रेषित करता है। ज्ञान से बढ़कर कुछ भी पवित्र नहीं है। उपनिषद गहन उत्तरों और सरल प्रश्नों का अद्भुत संगम हैं। ज्ञान बनाया नहीं जाता – हम केवल उसकी तरंग से संबंध स्थापित कर उसे प्राप्त करते हैं। और जहाँ ज्ञान समाप्त होता है, वहीं से बुद्धि या प्रज्ञा की यात्रा प्रारंभ होती है।

वेदांत सुप्रीम साइंस है जो सबको एकीकृत करता है

व्यक्ति और ब्रह्मांड की एकता ही आदि शांकरका जीव-ब्रह्म ऐक्य है।अद्वैत कहता है कि सब कुछ परस्पर जुड़ा हुआ है। दैनिक जीवन के विज्ञान की खोज करना ही वेदांत है। ज्ञान और वास्तविकता स्वभाव से सरल हैं— आज की तरह जटिल नहीं। ज्ञान में कोई अंतराल नहीं होता; ज्ञान एक ही है।दुर्भाग्य से हमने ज्ञान को कई भागों में बाँट दिया— जैसे विज्ञान, दर्शन, आदि। हर स्तर पर अद्वैत सम्भव है, इसी कारण आधुनिक विज्ञान भी इसे प्रमाणित कर रहा है। वेदांत सुप्रीम साइंस है जो सबको एकीकृत करता है, और इसलिए शंकर परंपरा (शंकर-न्यास) इसे एकता कहती है— यही अद्वैत है। जिसमें
द्वैत की कोई स्थायी संभावना नहीं,
मूल विचार एक ही है — सभी में मौलिक एकत्व।
बाकी सारी विविधताएँ उसी की विशेष अभिव्यक्तियाँ हैं।

सुप्रसिद्ध गायक राहुल आर. वेल्लाल ने आचार्य शंकर विरचित स्तोत्रों का किया गायन

भज गोविन्दम् – भज गोविन्दम् पर मंत्रमुग्ध हुए श्रोता

कार्यक्रम में कर्नाटक के सुप्रसिद्ध गायक राहुल आर. वेल्लाल ने आचार्य शंकर विरचित स्तोत्रों एवं भक्ति पदों का सुमधुर गायन किया। उन्होंने गणेश पँचरत्नम, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, शिवाष्टकम्, भवानी अष्टक, भज गोविन्दम, काल भैरवाष्टक, अयिगिरि नन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते…महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र एवं शिव शम्भो का गान किया।