इंदिरा खरे
22/10/25
लगभग एक सप्ताह पूर्व अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री 9 सितम्बर से एक सप्ताह के लिए भारतीय दौरे पर थे. विश्व के महत्वपूर्ण देश ही नहीं भारत में भी उनके इस विजिट को लेकर आश्चर्य था. क्योंकि अफगानिस्तान कि तालिबानी व्यवस्था अन्य मुस्लिम राष्ट्र से अलग है खास कर महिलाओं के प्रति, इसलिए आश्चर्य स्वाभाविक था. हुआ भी कुछ ऐसा. 10तारीख को अफ़ग़ानिस्तान के विदेश मंत्री आमीर खान मुत्ताकी की प्रेस वार्ता हुई जिसमें महिला पत्रकारों को नहीं बुलाया गया. स्वाभाविक है बवाल तो होना ही था.
सबसे पहले तो कई महिला पत्रकारों ने अफ़ग़ानिस्तान की महिलाओं की दशा जो कि उनके सरकार द्वारा बनाई गईं है की बखिया उधेड़ी और कुछ ने साफ साफ अपने पुरुष साथियों के लिए कहा कि उन्हें प्रेस वार्ता से बाहर आना चाहिए था.इस तरह विदेश मंत्री को आलोचना झेलनी पड़ी. और उन्होंने एक और प्रेस कांफ्रेंस बुलाई जिसमें महिला पत्रकारों को बुलाया. तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमीर खान मुत्ताकी द्वारा स्पष्टीकरण देना पड़ा कि उस समय कुछ कारणों से जल्दी में सीमित पत्रकारों को बुलाना पड़ा.
महिला पत्रकारों की एवं महिला जन प्रतिनिधियों की इस नो ‘एंट्री’ पर तीव्र प्रतिक्रिया आई.सबसे पहले तो हम बात करेंगे सबा मोहम्मद की जिन्होंने सबसे पहले अपनी प्रतिक्रिया दी उन्होंने ANI से कहा कि हमें एक ऐसे देश के विदेश मंत्री को इन्वाइट नहीं करना चाहिए था जहाँ की सरकार वहां की महिलाओं के विरुद्ध हो और सरकार पुरुषों द्वारा ही चलाई जा रही हो. अफगानिस्तान की तलिबानी सरकार द्वारा महिलाओं को स्कूल नहीं जाने दिया जाता. वे उनको ढक कर रखते है, वहां महिलाओं को उनकी हेल्थ केयर के लिए भी अधिकार नहीं है.शमा की प्रतिक्रिया अंग्रेजी में थी जिसका भावार्थ ही यहाँ दिया जा रहा है उन्होंने आगे अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि मै समझ नहीं पाई हमारे यहाँ की डिप्लोमेसी इतनी गिर जायगी कि हमें ऐसे देश के मंत्री को बुलाने की आवश्यकता पड़ेगी जो महिलाओं के आगे बढ़ने के खिलाफ है नो एंट्री पर हमारी सरकार ने क्यों नहीं कहा कि हमारी महिला पत्रकार भी प्रेस कांफ्रेंस अटेंड करेंगी. कोई भी एम्बसी उस देश के नियम को मानती है जो होस्ट होता है.
ये एक सख्त जवाब था हमारे देश की महिला पत्रकार की ओर से शमा मोहम्मद का वे कांग्रेस की है इनके अलावा तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा, कांग्रेस की सुप्रिया श्रीनेत, प्रियंका गाँधी, शिवसेना की प्रियंका चतुर्वेदी ने भी प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों की ‘नो एंट्री’ पर अफगानिस्तान की एम्बसी को एवं हमारी सरकार के चुप रहने पर करारा जवाब दिया है.
आपको बताते चलें कि तीन और महिला पत्रकारों ने अपनी प्रतिक्रिया दी है.
स्मिता शर्मा ने x पर लिखा है ” विदेश मंत्री जयशंकर और मुत्तकी के साथ बातचीत के बाद शुरुआती वक्तव्य में अफगानिस्तान की लड़कियों और महिलाओं की भयानक दुर्दशा का कोई उल्लेख नहीं किया गया. हमारी सुरक्षा की चिंताओं की वजह से मुत्ताकी का रेडकारपेट बिछाकर उस देश में स्वागत किया गया जो महिलाओं की उपलब्धि और नेतृत्व पर गर्व करते हैं. यह है आज की वैश्विक राजनीति “
निरुपमा सुब्रमण्यम ने लिखा “महिला सहकर्मियों को अलग रखने के मुद्दे पर क्यों पुरुष पत्रकारों ने अपना विरोध दर्ज़ नहीं कराया.”
गीता मोहन. लिखती हैं “अफगान तालिबान के विदेश मंत्री आमिरखान मुत्ताक़ी की प्रेस कांफ्रेंस में महिला पत्रकारों को निमंत्रण नहीं दिया गया. अस्वीकार.”
विजता सिंह ने लिखा ” मेरी राय में पुरुष पत्रकारों को विरोध के तौर पर उस प्रेस कांफ्रेंस से निकल जाना चाहिए था. “
आप समझ सकते हैं कि किस तरह से मीडिया वीमेन पावर ने हमेशा हमेशा के लिए कथित तौर पर ‘नो एंट्री ‘ को बैन करवा दिया., अब ऐसी हरकत के लिए दास बार सोचा जायेगा.
