विद्यार्थियों के साथ धोखा!जागेंगे कब हमारे पढ़े लिखे सी एम डॉ मोहन यादव.

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भोपाल
3/8/2025

शासन की स्वीकृति के बिना चल रहे मान्यता विहीन कोर्स

अटल बिहारी बाजपेयी हिन्दी विश्ववद्यालय में छात्र नहीं मगर अध्ययन केन्द्रों में 10 हजार से अधिक प्रवेश

शासकीय सेवा के लिए अमान्य शार्ट हैंड का कोर्स भी चला रहा विश्वविद्यालय

170 करोड से अधिक वसूली फीस

आज कांग्रेस की प्रेस वार्ता ने मध्य प्रदेश का भविष्य मीडिया के सामने खोल कर रख दिया. विद्यार्थियों का भविष्य इतने खतरनाक दिशा में जा सकता है इसकी जानकारी दिल्ली तक पहुँचनी चाहिए. प्रेस वार्ता से जो जानकारी मीडिया के सामने आई है उससे छात्र छात्राओं को जागरूक होना जरुरी है.

प्रेस वार्ता के अंश…….
मध्यप्रदेश में बड़े स्तर पर शासकीय विश्वविद्यालयों के माध्यम से ऐसे पाठ्यक्रमों का संचालन किया जा रहा है कि जिनसे ना तो विद्यार्थी को रोजगार प्राप्त हो सकता है, ना ही यह पाठ्यक्रम किसी मानक संस्था के द्वारा मान्यता प्राप्त हैं ।भूपेंद्र गुप्ता कांग्रेस प्रवक्ता ने बताया कि
मैंने अपनी इसी विषय पर आयोजित पूर्व प्रेस कान्फ्रेंस में भी विधानसभा में दिए गए उत्तर के हवाले से इस विषय को उठाया था कि अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय इलेक्ट्रो हेम्योपैथी का पाठ्यक्रम चलाती है जो किसी भी आयुष कौंसिल
या किसी भारतीय चिकित्सा पद्धति में मान्यता प्राप्त नहीं है । जिसमें विश्वविद्यालय ने इस बात की सार्वजनिक सफाई दी थी कि वे इन पाठ्यक्रमों को व्यवसाय के लिए नहीं बल्कि जागरूकता फैलाने के लिए चला रहे है । यह उद्देश्य अपने आप में ही भ्रामक है । जबकि विश्वविद्यालय से सूचना के अधिकार में प्राप्त जानकारी में विश्वविद्यालय ने बताया है कि वे ऐसा कोई भी पाठ्यक्रम नहीं चला रही है। जबकि उन्होंने यह भी बताया है कि इस पाठ्यक्रम की फीस 25000 रूपये है ।
विश्वविद्यालय में कोई भी पाठ्यक्रम तभी संचालित किया जा सकता है जब उनके पास उस विषय के मान्यता प्राप्त डिग्रीधारी शिक्षक एवं प्रयोगशाला हो। किन्तु जब इलेक्ट्रो होम्योपैथी का कोर्स ही मान्यता प्राप्त नहीं है तो उसके लिए डिग्रीधारी शिक्षक कहां से प्राप्त किये है यह बताने में विश्वविद्यालय असमर्थ है ।
किसी भी पाठ्यक्रम को अध्ययन केन्द्रों या डिस्टेंन्स एजुकेशन के माध्यम से पढ़ाने हेतु डीईबी (डिस्टेन्स एजुकेशन व्यूरो भारत सरकार) से अनुमति एवं मान्यता आवश्यक होती है । विश्वविद्यालय ने इस बात से इंकार किया है कि वे डिस्टेन्स एजुकेशन के माध्यम से पाठ्यक्रम चलाते हैं । जबकि विश्वविद्यालय ने स्वयं जानकारी दी है कि वे 2020-21 से अध्ययन केन्द्रों के माध्यम से पाठ्यक्रम चलाते है। 2020-21 में 62, सत्र 21-22 में 170, सत्र 22-23 में 157, सत्र 23-24 में 112, और सत्र 24-25 में 86 अध्ययन केन्द्र संचालित है । विश्वविद्यालय की 5 अप्रेल, 2022 की अधिसूचना के माध्यम

से जानकारी दी गई है कि इलेक्ट्रो होम्योपैथी कोर्स की फीस 25 हजार रूपये निर्धारित की गई ।
विश्वविद्यालय को इस बात की चिंता ही नहीं है कि अपने ही दस्तावेजों में वे खुद को झूठा सिद्ध कर रहा है । उन्होने बताया है कि उनके आंतरिक अध्यादेश क्रमांक 133 के माध्यम से वे ये कोर्स संचालित करते है । जबकि इस अध्यादेश में गैर मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों को चलाने की विश्वविद्यालय की शक्ति का कोई उल्लेख नही हैं । फंड इकठ्ठा करने एवं विश्वविद्यालय की आय बढ़ाने के लिए इस तरह के पाठ्यक्रमों को चलाकर विद्यार्थियों के साथ धोखा किया जा रहा है । संस्था के द्वारा संचालित अध्ययन केन्द्रों के माध्यम से वीडियो विज्ञापन दिए जा रहे है जिसका आशय है कि इन कोर्सों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का कार्य किया जा सकता है । मोटी-मोटी फीस वसूल कर विद्यार्थियों का एक साल बर्बाद कर उनको उन्मुक्त छोड़ दिया जाता है जिनमें से सैकडों लोग झोला छाप डाक्टरों की तरह प्रेक्टिस कर रहे है । इस उपचार से ग्रामीण क्षेत्र के कितने अशिक्षित मरीजों की मृत्यु तो नहीं हुई है यह जांच का विषय है । ऐसी मौतों की जिम्मेवारी विश्वविद्यालय को उठानी चाहिए । अभी ईएसबी की परीक्षा में ऐसे ही पेरामेडिकल कोर्स किये हुए मेरिट में आये परीक्षार्थियों को शासकीय सेवाओं में सत्यापन में अपात्र घोषित कर दिया गया है। मगर शासकीय बैनर दिखाकर छात्रों की बेरोजगारी की लाभ उठाकर उन्हें ऐसे विश्वविद्यालय खुले आम ठग रहे है ।
विश्वविद्यालय के कुलगुरू एवं कुलसचिव द्वारा जानबूझकर गैर मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रमों को चलाना आपराधिक उदासीनता का मामला है । विश्वविद्यालय के अध्ययन केन्द्रों मे सत्र 20-21 मे 2211, सत्र 21-22 में 5152, सत्र 22-23 में 2566 और सत्र 23-24 में 1659 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया था । लगातार विद्यार्थियों की घटती संख्या और लगातार अध्ययन केन्द्रों की घटती संख्या इस बात का प्रमाण है कि विद्यार्थियों में अटल बिहारी हिन्दी विश्वविद्यालय अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। विश्वविद्यालय के केम्पस में विद्यार्थियों की संख्या 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पा रही। हिन्दी में इंजीनियरिंग की शिक्षा एवं मेडिकल की शिक्षा के नाम पर जिन विद्यार्थियों ने भावनावश इन कोर्सों में प्रवेश ले लिया था वे मारे-मारे फिर रहे है । इसी तरह की गतिविधियां अगर किसी प्रायवेट संस्था द्वारा की जातीं तो उनको चलाने वाले जेल में होते । किन्तु शासकीय विश्वविद्यालयों द्वारा शासन की विश्वसनीयता के नाम पर इस तरह के भ्रामक कोर्स चलाना एक तरह की ठगी है जिन पर कार्यवाही होना चाहिए ।
संस्था द्वारा एनरोल किये गए छात्रों की फीस का औसत अगर 15 हजार रूपया भी मानी जावे तो विश्वविद्यालय अब तक विद्यार्थियों से लगभग 173 करोड़ रूपये की फीस वसूल जा चुकी है । इतनी भारी भरकम फीस के बाद कितने भी विद्यार्थियों को प्लेसमेंट मिला यह भी जांच का विषय है । अध्ययन केन्द्रों को मान्यता देने के नाम पर जो अवैध वसूली की गई है । उसकी जांच ईडी या सीबीआई को करना चाहिए, ताकि शिक्षा को रोजगार की जगह भटकाने का रास्ता बनाने वाले भ्रष्टाचारियों को दंडित किया जा सके। कांग्रेस पार्टी यह भी मांग करती है कि इन कोर्सेस को समय -समय पर संचालित करने वाले कुलगुरू, रजिस्ट्रार एवं परीक्षा नियंत्रकों की सम्पत्ति की जांच सरकार करवाऐ।
Credit:indira bhavan se.